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| जय बस्तरिया 16.08,2015 |
इन लम्हों में मैंने आसमां को समेटा है
दूर तक पीछा करता वो अधुरा चाँद था
उसकी चांदनी भी इक भरोसे ने लुटा है
मै दरिया हूँ बस समन्दर मेरी मंजिल
पर हसींन मोड़ ने हर मोड़ पर रोका है
कागज पर लिख इश्क खूब मिटा दिया
इश्क ने मुझे बस इतना दिया धोखा है
गुजरा क्या चाँद मेरे शहर से लुट गया
इस बस्ती ने किया हर इक से धोखा है
वो तितली चाँद जुगनू गज़लें ये किताबें
दुनिया में मुझको बस इतने ने रोका है
मुख्तसर सी बात है सवाल-ए-हक़ 'नादाँ'
इस मुख़्तसर सी जिद में खुद को झोंका है
16.08.2015
पर हसींन मोड़ ने हर मोड़ पर रोका है
कागज पर लिख इश्क खूब मिटा दिया
इश्क ने मुझे बस इतना दिया धोखा है
गुजरा क्या चाँद मेरे शहर से लुट गया
इस बस्ती ने किया हर इक से धोखा है
वो तितली चाँद जुगनू गज़लें ये किताबें
दुनिया में मुझको बस इतने ने रोका है
मुख्तसर सी बात है सवाल-ए-हक़ 'नादाँ'
इस मुख़्तसर सी जिद में खुद को झोंका है
16.08.2015

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