Thursday, 20 August 2015

वो तितली चाँद जुगनू गज़लें ये किताबें ....


जय बस्तरिया 16.08,2015
उन आँखों के शबनमी बूंदों को देखा है
इन लम्हों में मैंने आसमां को समेटा है

दूर तक पीछा करता वो अधुरा चाँद था
उसकी चांदनी भी इक भरोसे ने लुटा है

मै दरिया हूँ बस समन्दर मेरी मंजिल
पर हसींन मोड़ ने हर मोड़ पर रोका है

कागज पर लिख इश्क खूब मिटा दिया
इश्क ने मुझे बस इतना दिया धोखा है

गुजरा क्या चाँद मेरे शहर से लुट गया
इस बस्ती ने किया हर इक से धोखा है

वो तितली चाँद जुगनू गज़लें ये किताबें
दुनिया में मुझको बस इतने ने रोका है

मुख्तसर सी बात है सवाल-ए-हक़ 'नादाँ'
इस मुख़्तसर सी जिद में खुद को झोंका है

16.08.2015

 

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